jan jan ka chehra ek arth

पद्य-9 | जन-जन का चेहरा एक भावार्थ (सारांश) – गजानन माधव मुक्तिबोध | कक्षा-12 वीं | हिन्दी 100 मार्क्स

विवरण

jan jan ka chehra ek arth

आधारित पैटर्नबिहार बोर्ड, पटना
कक्षा12 वीं
संकायकला (I.A.), वाणिज्य (I.Com) & विज्ञान (I.Sc)
विषयहिन्दी (100 Marks)
किताबदिगंत भाग 2
प्रकारभावार्थ (सारांश)
अध्यायपद्य-9 | जन-जन का चेहरा एक
कीमतनि: शुल्क
लिखने का माध्यमहिन्दी
उपलब्धNRB HINDI ऐप पर उपलब्ध
श्रेय (साभार)रीतिका
पद्य-9 | जन-जन का चेहरा एक भावार्थ (सारांश) – गजानन माधव मुक्तिबोध | कक्षा-12 वीं

जन-जन का चेहरा एक

jan jan ka chehra ek arth

चाहे जिस देश प्रांत पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक !

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, चाहे किसी देश का हो चाहे किसी प्रांत का हो सभी लोगों का चेहरा एक है। सभी लोग एक समान है। jan jan ka chehra ek arth


एशिया की, यूरोप की, अमरीका की
गलियों की धूप एक ।
कष्ट-दुख संताप की,
चेहरों पर पड़ी हुई झुर्रियों का रूप एक !
जोश में यों ताकत से बँधी हुई
मुट्ठियों का एक लक्ष्य !

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक”

कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, एशिया, यूरोप, अमरीका सभी देशों गलियों की धूप एक सभी देशों मे एक ही सूर्य की रौशनी पहुचती है। जब लोग किसी परेशानी मे होते है, किसी कष्ट या दुख मे होते है। उस समय लोगों के चेहरे पर जो झुरीय दिखाई देती है, चेहरे पर जो लकिरे दिखाई देती है, वो एक ही होती एक समान होती है। जब एकसाथ जोश मे अपनी मुट्ठी बंद करते है। उन बँधी हुई मुट्ठियों की ताकत एक सी होती है उनका लक्ष्य एक होता है।


पृथ्वी के गोल चारों ओर के धरातल पर
है जनता का दल एक, एक पक्ष ।
जलता हुआ लाल कि भयानक सितारा एक,
उद्दीपित उसका विकराल सा इशारा एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, पूरी गोल पृथ्वी के चारों ओर धरातल पर जितने भी लोग है, जितनी भी जनता है, सभी का दल एक है, सभी एक ही पक्ष के है। (सभी मानव जाति के है।) जब जनता क्रोधित होती है तो उसका क्रोध उस लाल जलते हुए भयानक सूर्य की तरह होती है। उस गुस्से का जो इशारा होता है वो एक सा होता है। jan jan ka chehra ek arth


गंगा में, इरावती में, मिनाम में
अपार अकुलाती हुई,
नील नदी, आमेजन, मिसौरी में वेदना से गाती हुई,
बहती-बहाती हुई जिंदगी की धारा एक;
प्यार का इशारा एक, क्रोध का दुधारा एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, गंगा (भारत), इरावती (म्यांमार, बर्मा), मिनाम (अमेरिका) इनकी जो बेचैनी है जो वो एक ही है। नील नदी (अफ्रीका), आमेजन (दक्षणी अमेरिका), मिसौरी (मिसिसिप्पी नदी, संयुक्त राज्य अमेरिका), इन सभी नदियों की जो वेदना है, जो दुख है वो एक समान है। जिंदगी देने वाली इन नदियों की बहती धारा का वेग, शक्ति एक समान है। जितनी प्रेम से ये धरती को सींचती उस प्रेम का इशारा एक समान है, और क्रोधित होने पर जो दुष्ट प्रभाओ परता है उसकी धारा भी एक जैसी है। jan jan ka chehra ek arth


पृथ्वी का प्रसार
अपनी सेनाओं से किए हुए गिरफ्तार,
गहरी काली छायाएँ पसारकर,
खड़े हुए शत्रु का काले से पहाड़ पर
काला-काला दुर्ग एक,
जन शोषक शत्रु एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, इस पूरी पृथ्वी को शोषण करताओ ने अपने शोषण से, अपनी सेनाओ से गिरफ्तार किए हुए है। गहरी काली छाया पसारकर शत्रु जो है एक बड़े काले पहाड़ के समान खड़े है। इनका जो रास्ता है वो एक जैसा काला-काला है। जनता का जो शोषक है, जो शत्रु है वो एक जैसे है। 


आशामयी लाल-लाल किरणों से अंधकार
चीरता सा मित्र का स्वर्ग एक;
जन-जन का मित्र एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, इन अंधकारों की चीरने वाले आशा की लाल-लाल किरणे है। जब ये अंधकार खत्म होगा तो सभी मित्रों का सभी लोगों का स्वर्ग एक होगा। सभी लोगो के मित्र एक होंगे।


विराट् प्रकाश एक, क्रांति की ज्वाला एक,
धड़कते वक्षों में है सत्य का उजाला एक,
लाख-लाख पैरों की मोच में है वेदना का तार एक,
हिये में हिम्मत का सितारा एक ।
चाहे जिस देश, प्रांत, पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, जो ज्ञान का तेज प्रकाश है वो एक जैसा है, हमारे अंदर जो क्रांति की जो ज्वाला है वो एक जैसी है। हृदय मे धड़कते सत्य की जो रोशनी है वो एक जैसी है। लाखों लोग जो लाचार है जो कुछ नहीं कर पा रहे है उनकी वेदना जो है वो एक जैसी है। उनके हृदय मे जो हिम्मत का जो सितारा है वो एक जैसी है। चाहे वो किसी भी देश का हो, किसी भी प्रांत का हो जन जन का चेहरा एक है।


दूसरा खण्ड 

jan jan ka chehra ek arth

एशिया के, यूरोप के, अमरीका के
भिन्न-भिन्न वास स्थान;
भौगोलिक, ऐतिहासिक बंधनों के बावजूद,
सभी ओर हिंदुस्तान, सभी ओर हिंदुस्तान ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, एशिया, यूरोप, अमरीका भिन्न-भिन्न निवास स्थान है जहाँ लोग रहते है। भौगोलिक, ऐतिहासिक बहुत से बंधन है इन बंधनों के बावजूद भी सभी ओर हिंदुस्तान के लोग रहते है सभी ओर हिन्दुस्तानी है।


सभी ओर बहनें हैं, सभी ओर भाई हैं ।
सभी ओर कन्हैया ने गायें चराई हैं
जिंदगी की मस्ती की अकुलाती भोर एक;
बंसी की धुन सभी ओर एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, सभी लोग एक दूसरे को भाई-बहन की तरह प्यार है। सभी लोग भाई-बहन की तरह रहते है। कोई ऐसा जगह नहीं है जहाँ कृष्ण की लिलयों का वर्णन नहीं है। सभी ओर कन्हैया ने गाये चराई है। जिंदगी मे बहुत बेचैनी है पर उन बेचैनीयों मे मस्ती की जो भोर है वो एक ही है। कृष्ण की बंसी की जो धुन है, वो सभी को प्यारी है, सभी के लिए ये धुन एक ही प्रकार की है।


दानव दुरात्मा एक,
मानव की आत्मा एक ।
शोषक और खूनी और चोर एक ।
जन-जन के शीर्ष पर,
शोषण का खड्ग अति घोर एक ।
दुनिया के हिस्सों में चारों ओर
जन-जन का युद्ध एक,

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, जो दानव है दुरात्मा है वो एक समान है। सभी मानव की जो आत्मा है वो एक समान है। जो शोषक है, खूनी और चोर है सब एक जैसे ही दिखाई देते है। सभी लोगों पर जो शोषण की तलवार है वो एक जैसी है। दुनिया के सभी हिस्सों मे, चारों ओर जन-जन का युद्ध एक ही जैसा है। 


मस्तक की महिमा
व अंतर की ऊष्मा
से उठती है ज्वाला अति क्रुद्ध एक ।
संग्राम का घोष एक,
जीवन संतोष एक ।

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, लोगों की माथे पर जो चिंता की लकीर है वो एक जैसी है और उनके अंदर जो ऊष्मा है, हृदय की जो ज्वाला है, उसका क्रुद्ध है जो क्रोध है, वो एक जैसा है। इसके विरुद्ध जो युद्ध हम करते है उस युद्ध की घोषणा एक जैसी है। जीवन का संतोष एक जैसा है।

क्रांति का, निर्माण का, विजय का सेहरा एक,
चाहे जिस देश, प्रांत, पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक !

व्याख्या

प्रस्तुत पंक्तिया दिगंत भाग-2 के “जन-जन का चेहरा एक” कविता से ली गई है। इसके कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, शोषण के विरुद्ध जो हम क्रांति करते है, उसके निर्माण का उसके विजय का जो सेहरा है वो एक समान है। चाहे हम जिस भी देश के हो, जिस भी प्रांत के हो जन जन का चेहरा एक है। हम सब एक ही है।


सारांश

व्याख्या

“जन-जन का चेहरा एक” कविता कवि “गजानन माधव मुक्तिबोध जी” द्वारा लिखी गई है। कवि ने इस कविता मे आंतरिक एकता को दिखाते हुए जनता के संघर्षकारी संकल्प मे प्रेरणा और उत्साह का संचार करते है। इन पंक्तियों कवि कहते है की, चाहे किसी देश का हो चाहे किसी प्रांत का हो सभी लोगों का चेहरा एक है। सभी लोग एक समान है। jan jan ka chehra ek saransh

एशिया, यूरोप, अमरीका सभी देशों गलियों की धूप एक है। जब लोग किसी परेशानी मे, कष्ट या दुख मे होते है। उस समय लोगों के चेहरे पर जो झुरीय, जो लकिरे दिखाई देती है, वो एक ही होती एक समान होती है। जब एकसाथ जोश मे अपनी मुट्ठी बंद करते है। उन बँधी हुई मुट्ठियों का लक्ष्य एक होता है।

पूरी गोल पृथ्वी के चारों ओर धरातल पर जितने भी लोग और जनता है, सभी का दल और पक्ष एक है। (सभी मानव जाति के है।) जब जनता क्रोधित होती है तो उसका क्रोध उस लाल जलते हुए भयानक सूर्य की तरह होती है। उस गुस्से का जो इशारा होता है वो एक सा होता है।

jan jan ka chehra ek saransh

गंगा, इरावती, मिनाम की जो बेचैनी है, वो एक ही है। नील नदी, आमेजन, मिसौरी इन सभी नदियों की जो वेदना है, वो एक समान है। जिंदगी देने वाली इन नदियों की बहती धारा का संगीत एक समान है। जितनी प्रेम से ये धरती को सींचती उस प्रेम का इशारा एक समान है, और क्रोधित होने पर जो दुष्ट प्रभाओ परता है, उसकी धारा भी एक जैसी है।

आशा की लाल-लाल किरणे जब काले अंधकार को खत्म करेगी, तो सभी मित्रों का, सभी लोगों का स्वर्ग एक होगा। जो ज्ञान का तेज प्रकाश है वो एक जैसा है, हमारे अंदर जो क्रांति की जो ज्वाला है वो एक जैसी है। हृदय मे धड़कते सत्य की जो रोशनी है, वो एक जैसी है। लाखों लोग जो लाचार है, उनकी वेदना जो है वो एक जैसी है। उनके हृदय मे जो हिम्मत का जो सितारा है वो एक जैसी है।

jan jan ka chehra ek saransh

सभी लोग भाई-बहन की तरह रहते है। कोई ऐसा जगह नहीं है, जहाँ कृष्ण की लिलयों का वर्णन नहीं है। सभी ओर कन्हैया ने गाये चराई है। जिंदगी मे बहुत से बेचैनी है, पर उन बेचैनी मे मस्ती की जो भोर है वो एक ही है। कृष्ण की बंसी की जो धुन है, वो सभी को प्यारी है, सभी के लिए ये धुन एक ही प्रकार की है।

जो शोषक है, खूनी और चोर है सब एक जैसे ही दिखाई देते है। सभी लोगों पर जो शोषण की तलवार है वो एक जैसी है। लोगों की माथे पर जो चिंता की लकीर है और उनके अंदर जो ऊष्मा है, हृदय की जो ज्वाला है, उसका (क्रुद्ध) क्रोध है, वो एक जैसा है। शोषण के विरुद्ध जो हम क्रांति,जो युद्ध करते है, उसके निर्माण का उसके विजय का जो सेहरा है वो एक समान है। चाहे हम जिस भी देश के हो, जिस भी प्रांत के हो जन जन का चेहरा एक है। हम सब एक ही है।


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